चलते चलते एक दिन, यूँ ही उन से टकरा गए।
मुलाकातें बढ़ी, बातें बढ़ी, न हुई ख़बर अनजाने ही, कब उनके करीब आ गए।
जब भी हो मुलाकात, यह दिल धड़कता था।
न मिल पाये किसी दिन उनसे, यह दिल तड़पता था।
न सोचा था होगी हमको भी किसी से मोहब्बत।
इस कदर खींचेगी हमको भी किसी की चाहत।
प्रेम के पंछी ने अपना पंख जो फैलाया।
इस दिल की उड़ान में, आखिर एक हमसफ़र पाया।
यह सोच कर, अक्सर नहीं होता है यह प्यार,
बिना समय गवाए हमने भी कर दिया इश्क का इज़हार।
पर कमज़ोर था यह इश्क, जो नहीं हुई कुबूल।
अब समझाना था मुश्किल दिल को, जिसने की थी यह भूल।
हमने तो चाहा था दिल ही से, पर हमें यह मोहब्बत रास न आई।
जितना चाहा, वोह करीब हों, उतनी ही हमने दूरी पायी।
अब वोह सपना ही लगता है, यादें भी हुई धुंदली।
दिमाग ही नहीं, दिल भी करता है विश्वास, कोई मुझसे नहीं थी मिली।
यह चाहत, क्या सागर है या कोई मेला है?
मेरा दिल जो निकला था बेफिक्री में, अब बिकुल अकेला है, अब बिलकुल अकेला है....
PS: It took me more than a year to finish this, though bulk of it was written even before I started blogging. I was not able to give it a meaningful ending. Though I still feel that the ending could be better, but I thought, it was stupid to keep it incomplete for such a long time. So I sat for almost 2 hours today and finally finished it.
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Thursday, January 1, 2009
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1 comment:
Thats quite amazing.
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